दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा का पर्व बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा अर्चना का विशेष महत्व होता है। सुबह-सुबह गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है और उसे फूलों, दीपों और रंगोली से सजाया जाता है। इसके बाद विधि-विधान से गोवर्धन की पूजा की जाती है।
इस पूजा में धूप, दीप, जल, फल, फूल, नैवेद्य, खील, बताशे और खासतौर पर ओंगा (अपामार्ग) का प्रयोग किया जाता है। लेकिन गोवर्धन पूजा की सबसे विशेष परंपरा है — भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग लगाना
पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र देव के प्रकोप से ब्रजवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर सात दिनों तक उठाए रखा, तब उन्होंने उन सात दिनों में कुछ भी नहीं खाया। माता यशोदा भगवान कृष्ण को रोज़ आठ बार भोजन कराती थीं।
इस तरह सात दिन के हिसाब से 7×8=567×8 = 567×8=56 व्यंजन बनते हैं।
इसी कारण से गोवर्धन पूजा के दिन 56 प्रकार के व्यंजन बनाकर भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाते हैं।
56 भोग में क्या-क्या शामिल होता है?
इस भोग में मीठे, नमकीन, खट्टे, कड़वे और कसैले — हर स्वाद के व्यंजन शामिल किए जाते हैं। इसमें पूड़ी, हलवा, लड्डू, खीर, मालपुआ, माखन-मिश्री, फल, दही, मिष्ठान, पकौड़े और कई प्रकार के पारंपरिक व्यंजन भगवान को समर्पित किए जाते हैं।
