सनातन धर्म में जन्म से मृत्यु तक हर संस्कार का विशेष महत्व बताया गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु पंचक काल में होती है, तो इसे सामान्य नहीं माना जाता। धार्मिक मान्यताओं और गरुड़ पुराण में पंचक के दौरान हुई मृत्यु को बेहद संवेदनशील बताया गया है। यही कारण है कि लोग इस समय को लेकर भय और चिंता में रहते हैं।
ज्योतिष के अनुसार जब चंद्रमा कुंभ और मीन राशि में गोचर करता है, तब पंचक बनता है। यह धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्रों से मिलकर बनता है। मान्यता है कि पंचक में किए गए कार्यों का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। इसी वजह से इस दौरान शुभ कार्यों के साथ अंतिम संस्कार को भी विशेष नियमों के अनुसार किया जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार पंचक में मृत्यु होने पर परिवार पर “पांच का योग” बनता है, यानी परिवार के अन्य सदस्यों पर संकट की आशंका मानी जाती है। हालांकि शास्त्रों में इसके समाधान भी बताए गए हैं। दाह संस्कार के समय कुश या आटे के पाँच पुतले शव के साथ रखकर उनका भी विधिवत दाह किया जाता है। इसे पंचक दोष निवारण का सबसे प्रभावी उपाय माना गया है।
इसके अलावा गरुड़ पुराण का पाठ, गायत्री मंत्र जाप, नक्षत्र शांति पूजा और तेरहवीं पर विशेष दान करने से दोष शांत होता है। विद्वानों का कहना है कि पंचक दोष के डर से अंतिम संस्कार में देरी नहीं करनी चाहिए, बल्कि योग्य पुरोहित के मार्गदर्शन में सभी धार्मिक नियम पूरे करने चाहिए।धर्म शास्त्रों के अनुसार सही विधि-विधान और श्रद्धा के साथ किए गए कर्म दोषों को शांत कर देते हैं। ऐसे कठिन समय में धैर्य, आस्था और योग्य मार्गदर्शन सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।
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