प्राचीन शास्त्रों में ग्रहण और सूतक काल से जुड़े अनेक नियम बताए गए हैं। वसिष्ठ ऋषि के अनुसार –
“पुत्रजन्म, यज्ञ, सूर्य संक्रांति और सूर्य-चंद्र ग्रहण के समय रात्रि में भी स्नान करना चाहिए।”

ग्रहण और सूतक काल में कुछ कार्य वर्जित माने जाते हैं। इसमें मूर्ति स्पर्श, अनावश्यक भोजन करना, मैथुन, निद्रा, नाखून काटना और तैलाभ्यंग (तेल लगाना) शामिल हैं। यह नियम शुद्धता और आध्यात्मिक साधना से जुड़े हैं।

शास्त्रों में स्पष्ट किया गया है कि वृद्ध, रोगी, बालक और गर्भवती महिलाओं को आवश्यकता पड़ने पर भोजन और दवाई लेने की अनुमति है।

विशेषकर गर्भवती स्त्रियों को ग्रहण के समय सब्जी काटने, पापड़ सेंकने या किसी भी प्रकार के काटने-छीलने के काम से परहेज़ करना चाहिए। इस अवधि में धार्मिक ग्रंथों का पाठ, भजन-कीर्तन और प्रसन्नचित रहना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे गर्भस्थ शिशु स्वस्थ, सद्गुणी और तेजस्वी होता है।

आचार्य और पुराणों के अनुसार, ग्रहण और सूतक काल में स्नान, दान और मंत्रजप करने से पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है।

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