सनातन धर्म में परिक्रमा केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं बल्कि गहरी आध्यात्मिक साधना मानी जाती है। मंदिर, तीर्थ, देवी-देवता या पवित्र वृक्षों की परिक्रमा करने का उद्देश्य ईश्वर को जीवन का केंद्र मानना होता है। यही कारण है कि श्रद्धालु मंदिर पहुंचते ही सबसे पहले परिक्रमा करते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परिक्रमा करने से मन शुद्ध होता है, नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और साधक को पुण्य फल की प्राप्ति होती है। यह ईश्वर के प्रति समर्पण और आस्था का प्रतीक भी है।

परिक्रमा के नियम भी अलग-अलग देवी-देवताओं के अनुसार बताए गए हैं। जैसे भगवान गणेश की तीन, भगवान विष्णु, राम और कृष्ण की चार, सूर्य देव की सात परिक्रमा शुभ मानी जाती है। वहीं भगवान शिव की केवल आधी परिक्रमा करने का विधान है, जबकि माता दुर्गा की एक परिक्रमा ही पर्याप्त मानी जाती है।

विशेष बात यह है कि पीपल के वृक्ष की परिक्रमा हमेशा विषम संख्या में करनी चाहिए। वहीं किसी यज्ञ कुंड की तीन बार परिक्रमा करना शुभ माना गया है।

ध्यान रखने योग्य बात यह है कि परिक्रमा हमेशा घड़ी की दिशा में यानी दाईं ओर से करनी चाहिए। शिवलिंग की पूर्ण परिक्रमा नहीं करनी चाहिए और जलहरी को पार नहीं करना चाहिए।

धार्मिक मान्यता है कि परिक्रमा करते समय मन शांत, विचार सकारात्मक और भाव पूर्ण श्रद्धा से भरे होने चाहिए। नंगे पैर परिक्रमा करना और मंत्र जाप करते हुए चलना अधिक फलदायी माना गया है।

अगर किसी कारणवश पूरी परिक्रमा संभव न हो, तो एक ही स्थान पर घूमकर भी श्रद्धा के साथ परिक्रमा का पुण्य प्राप्त किया जा सकता है।

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. AC News इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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