धार्मिक ग्रंथों में कई ऐसे प्रसंग मिलते हैं जो भक्ति और बुद्धि का अद्भुत संगम दिखाते हैं। ऐसा ही एक रोचक प्रसंग रामायण में मिलता है, जब हनुमान जी माता सीता की खोज में लंका के लिए प्रस्थान करते हैं। इस दौरान उनके पास प्रभु श्रीराम की दी हुई पहचान की अंगूठी थी, जिसे सुरक्षित रखना बेहद जरूरी था।
जब वानर सेना सीता माता की खोज में निकली, तब श्रीराम ने हनुमान जी को अपनी मुद्रिका सौंपी। यह अंगूठी सिर्फ एक आभूषण नहीं, बल्कि विश्वास और पहचान का प्रतीक थी, ताकि माता सीता समझ सकें कि हनुमान जी वास्तव में रामदूत हैं।
समुद्र पार करने का सफर आसान नहीं था—तेज हवाएं, ऊंची लहरें और राक्षसी बाधाएं हर कदम पर चुनौती बन सकती थीं। ऐसे में अंगूठी खोने का खतरा भी था। लेकिन हनुमान जी ने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए इसे सबसे सुरक्षित स्थान पर रखा—अपने मुख (मुंह) के भीतर।
इसका उल्लेख रामचरितमानस के सुंदरकांड में गोस्वामी तुलसीदास जी ने स्पष्ट रूप से किया है—
“हनुमान तेहि समय मुद्रिका दीन्हि, मुख महुं राखि कपि गवनु कीन्हि।”
लंका पहुंचकर जब हनुमान जी ने अशोक वाटिका में सीता माता को देखा, तो उन्होंने वही अंगूठी उनके सामने प्रस्तुत की। अंगूठी देखते ही माता सीता की आंखों में आशा की किरण जाग उठी।
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