सनातन धर्म में मृत्यु को जीवन का अटल सत्य माना गया है। जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति को एक दिन इस संसार से विदा होना पड़ता है। यही कारण है कि हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार से जुड़ी हर प्रक्रिया का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बताया गया है। इन्हीं परंपराओं में एक महत्वपूर्ण परंपरा है मृतक के शरीर के हाथ-पैर बांधना। अक्सर लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि अंतिम यात्रा से पहले शव के हाथ-पैर क्यों बांधे जाते हैं और इसके पीछे क्या धार्मिक कारण हैं।

गरुड़ पुराण के प्रेत कल्प में मृत्यु और अंतिम संस्कार से संबंधित अनेक नियमों का वर्णन किया गया है। इनमें मृत्यु के बाद शरीर की तैयारी, अंतिम यात्रा और आत्मा की शांति के लिए किए जाने वाले धार्मिक कर्मों का उल्लेख मिलता है।

क्या कहता है गरुड़ पुराण?

गरुड़ पुराण में वर्णित धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा कुछ समय तक अपने शरीर के प्रति मोह रख सकती है। मान्यता है कि आत्मा अपने पुराने शरीर से पूरी तरह अलग होने में समय लेती है और पुनः शरीर में प्रवेश करने का प्रयास भी कर सकती है। इसी विश्वास के आधार पर शव के हाथ-पैर बांधे जाते हैं तथा आंखें और मुंह बंद किए जाते हैं।

इसके साथ ही नाक और कान में रूई लगाने की परंपरा भी प्रचलित है। यह सभी प्रक्रियाएं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आत्मा की अंतिम यात्रा को शांतिपूर्ण और विधिपूर्वक संपन्न कराने के उद्देश्य से की जाती हैं।

शव को अकेला क्यों नहीं छोड़ा जाता?

गरुड़ पुराण में यह भी उल्लेख मिलता है कि अंतिम संस्कार से पहले मृत शरीर को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस समय नकारात्मक शक्तियां सक्रिय हो सकती हैं। इसलिए परिवार के सदस्य और परिजन शव के पास उपस्थित रहते हैं तथा धार्मिक नियमों और संस्कारों का पालन करते हैं।

आत्मा की शांति से जुड़ी है परंपरा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अंतिम संस्कार होने तक आत्मा का अपने शरीर से मोह पूरी तरह समाप्त नहीं होता। इसी कारण सनातन परंपरा में विभिन्न विधियों और संस्कारों का पालन किया जाता है ताकि आत्मा को शांति प्राप्त हो और उसकी अंतिम यात्रा शुभ एवं मंगलमय हो सके।

हालांकि यह सभी बातें गरुड़ पुराण और सनातन धर्म में वर्णित धार्मिक मान्यताओं एवं विश्वासों पर आधारित हैं। विभिन्न समुदायों और क्षेत्रों में इन परंपराओं को अलग-अलग तरीके से निभाया जाता है।

नोट: यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रीय वर्णनों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल धार्मिक एवं सांस्कृतिक जानकारी प्रदान करना है।

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