सनातन धर्म में स्कंद षष्ठी व्रत का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। यह पावन तिथि भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय को समर्पित होती है, जिन्हें स्कंद, मुरुगन और देवसेनापति के नाम से भी पूजा जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा और व्रत करने पर साधक को जीवन के अनेक कष्टों से मुक्ति मिलती है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान कार्तिकेय शौर्य, साहस और विजय के देवता माने जाते हैं। उनकी कृपा से व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास बढ़ता है और वह कठिन परिस्थितियों का डटकर सामना कर पाता है। स्कंद षष्ठी व्रत को शत्रु बाधा दूर करने वाला और सफलता दिलाने वाला माना गया है। कहा जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से साधक गुप्त और प्रकट शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है।
हनुमान बाहुक पाठ से दूर होते हैं कष्ट
स्कंद षष्ठी का व्रत संतान सुख की कामना करने वालों के लिए भी अत्यंत फलदायी माना गया है। मान्यता है कि नि:संतान दंपत्तियों को भगवान कार्तिकेय का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। वहीं विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए भी यह व्रत लाभकारी माना गया है। इससे एकाग्रता बढ़ती है और करियर में सफलता के मार्ग खुलते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान कार्तिकेय के मंत्रों का जप करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है —
“देव सेनापते स्कंद कार्तिकेय भवोद्भव।
कुमार गुह गांगेय शक्तिहस्त नमोस्तु ते॥”
“ॐ शारवाना-भावाया नमः॥”
मान्यता है कि श्रद्धा और भक्ति से की गई पूजा व्यक्ति के जीवन में सुख, सौभाग्य और सफलता लेकर आती है।
